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Wednesday, 28 September 2016

असकोट राज, पिथौरागढ़, उत्तराखंड

                                                   
       

                                                             असकोट राज (ज़मींदारी)

                                            शासक वंश- सूर्यवंशी (कत्यूरी/पाल)

वर्तमान प्रमुख- राजवर भानुराज सिंह। इनकी सुपुत्री, राजकुमारी गायत्री का विवाह जोधपुर के राजकुमार शिवराज सिंह से हुआ।

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में भारत-नेपाल सीमा पर एक नगर है असकोट, यह तेरहवीं शताब्दी में कत्यूरी शासकों की एक शाखा द्वारा बसाया गया।
इतिहासकारों में कत्यूरी शासकों को ले कर कई मतभेद हैं, इनके विषय में विशेष प्रामाणिक लेख उपलब्ध नही हैं।
ब्रिटिश सरकार ने अपने शासनकाल में ई.टी.एटकिंसन को उत्तरी प्रांतों की जिलेवार रिपोर्ट बनाने के लिए नियुक्त किया। एटकिंसन के अनुसार कत्यूरी साम्राज्य उत्तर में भागलपुर (बिहार) से ले कर पश्चिम में काबुल (अफ़ग़ानिस्तान) तक था। [बद्री दत्त पाण्डेय के अनुसार कत्यूरी मूल रूप से अयोध्या से थे एवं उनका राज्य नेपाल से अफ़ग़ानिस्तान तक था]
किंवदंतियों और एटकिंसन के अनुसार शालिवाहन देव अयोध्या से हिमालय जाकर बद्रीनाथ के निकट जोशीमठ में बसे। उन्हीं के वंशज वासुदेव ने कत्यूरी वंश की स्थापना की। एटकिंसन ने असकोट के तत्कालीन राजवर से प्राप्त जानकारी और ताम्रपत्र शिलालेखों के आधार पर असकोट राजपरिवार के विषय में हिमालयन गज़ेटियर में लिखा।
छठी और सातवीं शताब्दी में कत्यूरी वंश का साम्राज्य अपने चरम पर था। फिर आपसी सामंजस्य की कमी और पारिवारिक कलह के चलते उसके पतन का दौर आया।

सम्राट ब्रह्म देव के पौत्र अभय पाल देव परिवार से विमुख हो कर एक शांत दूरस्थ क्षेत्र की ओर चले आये जिसे आज असकोट कहते हैं। यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा था एवं आबादी नगण्य थी। परिवार की मुख्यधारा से अलग हो कर अभय पाल देव ने अपने नाम के आगे से देव हटा दिया। तब से आज तक उनके वंशज अपना उपनाम पाल लिखते हैं।
कुछ ही समय में पाल वंश ने स्वयं को पुनर्वासित कर राज्य में अस्सी कोट/किले स्थापित किये (जिनमें से कुछ वर्तमान में नेपाल में आते हैं) और राज्य को नाम दिया अस्सीकोट जिसे कालांतर में असकोट कहा जाने लगा।
बारहवीं शताब्दी के अंत में वन रावतों को हरा कर पाल वंश का विस्तार हुआ।
राजा ने लखनपुर नामक जगह को अपनी राजधानी बनाया। यहीं चौदहवीं और पन्द्रहवीं शताब्दी में पाल परिवार बसा। आज यह पूरी तरह उजड़ा हुआ है। एटकिंसन हिमालयन गज़ेटियर में लिखते हैं कि 1581 में असकोट पर अल्मोड़ा के राजा रूद्र चंद्र की संप्रभुता हो गयी। 1588 में राजवर राय पाल और उनके पूरे परिवार की निर्मम हत्या कर दी जाती है। परिवार का एकमात्र जीवित सदस्य था एक नवजात शिशु (महेंद्र पाल) जिसे दाई/आया ने बचा लिया था। बाद में महेंद्र पाल को लालन-पालन के लिए अल्मोड़ा नरेश रूद्र चन्द्र के पास भेज दिया जाता है। महेन्द्रपाल के बड़े होने पर अल्मोड़ा नरेश असकोट राज पुनः बहाल कर देते हैं।
महेन्द्रपाल वापस असकोट आते हैं पर उन्होंने राजधानी लखनपुर में बसने के बजाय देवाल में एक मज़बूत किला बनाया। पूरे पत्थर का यह किला हमले की स्थिति में पूरी तरह सुरक्षित था!
एटकिंसन गज़ेटियर में राजवर महेन्द्रपाल और उनके काका रूद्र पाल के बीच हुए संपत्ति विवाद का ज़िक्र करते हैं।
रूद्रपाल और उनके अनुज को उनके हिस्से का राज्य दे दिया गया। अस्सी गाँव महेन्द्रपाल और बाकी के चौबीस रूद्रपाल के पुत्रों में बंट गए।
बहादुर पाल की मृत्यु के बाद पुष्कर पाल असकोट के राजवर बने, पाल वंशियों ने सीमायें बढ़ाने, कब्ज़े करने के बजाय खुद के राज्य को सम्पन्न बनाने की दिशा में काम किया।
एटकिंसन गज़ेटियर में लिखते हैं कि कत्यूरी राजकुमारों को राज्यवर कहके सम्बोधित किया जाता था। 1204 में राजवर इंद्रदेव द्वारा दिये गए एक भूमि अनुदान पत्र से ऐसी जानकारी प्राप्त होती है।
पाल वंश की वंशावली में केवल ज्येष्ठ पुत्रों का उल्लेख है।
उत्तर प्रदेश ज़मींदारी अधिनियम और कुमाऊं ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम के अंतर्गत असकोट ज़मींदारी का अंत हुआ।
भारत में ऐसे चंद ही क्षत्रिय राज वंश हैं जिनका इतने लंबे समय तक का शासकीय इतिहास है, इसीलिए असकोट के सूर्यवंशी शासकों को शताब्दियों तक सम्मान मिला।
असकोट राज पर भले ही कालांतर में अन्य शासकों की सम्प्रभुता रही (चन्द, गोरखा, अंग्रेज़) पर उन सभी ने पारंपरिक रूप से पाल सूर्यवंशी कुल के विशिष्ट ऐतिहासिक महत्त्व को मान्यता दी।
इनका महत्व इनकी शक्ति और इनके धन के चलते नहीं, अपितु इसलिए था क्योंकि वे शाही कत्यूरी वंशज थे। ये भोग विलासिता से दूर बहुत ही साधारण जीवन व्यतीत करते थे। अट्ठारहवीं शताब्दी में जब गोरखा आक्रमण हुआ तो वे कांगड़ा तक काबिज़ हो गए पर उन्होंने असकोट में कोई हस्तक्षेप नहीं किया।
नेपाली गोरखा और अंग्रेज़ों के मध्य हुए युद्ध में गोरखा हार गए। सिधौली संधि के तहत अस्कोट भी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन गया।
अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए भी कत्यूरी वंश की यह शाखा धर्म-परायण रही, अपनी संस्कृति को जीवंत रखा। बच्चों में संस्कार रहे। भोजन उच्च वर्ण का ब्राह्मण ही बनाता था।
एटकिंसन लिखते हैं कि राजवर पुष्कर पाल उत्तानपाद की दो सौ इक्कीसवीं पीढ़ी थे।
पाल एक उपनाम है, वे कत्यूरी शाखा के विशुद्ध सूर्यवंशी हैं। महादेव इनके आराध्य हैं।
उत्तर प्रदेश में बसे पाल और सूर्यवंशी उपनाम वाले क्षत्रिय इसी कत्यूरी वंश की शाखा हैं और कुमाऊँ-गढ़वाल से आ कर उ•प्र• में बसे।
बस्ती जिले के अमोढ़ा राज और महसों राज एवं बाराबंकी का हड़हा राज  इसी वंश के हैं।  पाल सूर्यवंशियों की प्रथम स्वतंत्र संग्राम में अति महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इनकी संख्या शेष वंशों की तुलना में बहुत कम है. उत्तर प्रदेश में इन्हें क्षत्रियों में सबसे उच्च वर्ण का माना जाता है !

अस्कोट राज
वंशावली-
सम्राट ब्रह्म देव
राजवर अभय पाल देव
राजवर निर्भय पाल
राजवर भरत पाल
राजवर भैरव पाल
राजवर भूपाल
राजवर रतनपाल
राजवर शंखपाल
राजवर श्यामपाल
राजवर साईंपाल
राजवर सुरजन पाल
राजवर भोजपाल
राजवर भरत पाल
राजवर स्तुतिपाल
राजवर अच्छवपाल
राजवर त्रिलोकपाल
राजवर सूर्यपाल
राजवर जगतपाल
राजवर प्रजापाल
राजवर रायपाल
राजवर महेन्द्रपाल
राजवर जैतपाल
राजवर बीरबल पाल
राजवर अमरपाल
राजवर अभयपाल
राजवर उच्छब पाल
राजवर विजयपाल
राजवर महेन्द्रपाल
राजवर बहादुरपाल
राजवर पुष्करपाल
राजवर गजेंद्रपाल
राजवर विक्रम बहादुरपाल
राजवर टिकेंद्र बहादुरपाल
राजवर भानुराज सिंह पाल

Friday, 26 August 2016

हिन्दू धर्मरक्षक राणा सांगा


हिन्दुस्तान की धरती पर ऐसे शूरवीरों ने जन्म लिया है कि उनके विषय में लिखने में स्याही कम पड़ जाए...पर दुर्भाग्यवश, राष्ट्र की अखंडता और धर्मरक्षा के लिए आजीवन संघर्षरत रहे उन वीरों को इतिहास की किताबों और पाठ्यक्रम में या तो सीमित या बिलकुल भी जगह नहीं मिली। ऐसे ही एक महापराक्रमी शासक को यह लेख समर्पित है। एक ऐसे धर्मरक्षक योद्धा जिन्होंने मातृभूमि, धर्म और सम्मान की रक्षा के लिएअपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

                                                    *महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा)*


12 अप्रैल 1484 को मालवा में मेवाड़ के सूर्यवंशी सिसोदिया राजकुल में राणा सांगा का जन्म हुआ।1507-1508 में राणा सांगा अपने पिता राणा रायमल के उत्तराधिकारी बने। इनका विवाह रानी कर्णावती से हुआ।राणा ने अपने शासन काल में निम्नलिखित युद्ध लड़े।


*ईडर के युद्ध् (1514)*
ईडर राजस्थान-गुजरातसीमा पर स्थित राठौड़ों की गद्दी थी जिसके उत्तराधिकारी रायमल थे पर भारमल उस पर अवैध रूप से काबिज़ था।राणा ने भारमल को पराजित कर रायमल को ईडर की कमान दिलाई।भारमल हार कर मदद के लिए गुजरात के सुल्तान मुजफ़्फ़र के पास चला गया।ईडर की गद्दी के लिए तीसरे युद्ध में महाराणा की सेना का सामान सुल्तान मुज़फ्फर द्वारा भेजे गए सैन्य अधिकारी ज़ाहिर-उल-मुल्क से हुआ। युद्ध में ज़ाहिर मारा गया और सुल्तान की फ़ौज राजपूतों के आगे ज़्यादा देर ना टिकी और भाग खड़ी हुई।बौखलाहट में सुल्तान अपने खास योद्धा नुसरत-उल-मुल्क को भेजता है, रायमल उसे भी पराजित कर देते हैं।


*खतौली का युद्ध 1518*
विदेशी आततायी इब्राहिम लोधी से मातृभूमि को मुक्त कराने निकली राणा की सेना ने कई ठिकानों पर कब्ज़े शुरू कर दिए जिसकी खबर लोधी को जब लगी तो उसने मेवाड़ के लिए कूच किया। महाराणा भी अपनी सेना के साथ उसका मुकाबला करने निकल पड़े। दोनों का आमना सामना खतौली में हुआ।निर्भीक राजपूतों के आगे सुल्तान की फ़ौज 5 घण्टों से ज़्यादा नहीं टिकी, इब्राहिम लोधी अपनी सेना के साथ भाग खड़ा हुआ। एक लोधी शहज़ादा बन्दी भी बनाया गया।इस युद्ध में महाराणा की बाँह कट गयी एवं एक पैर सदा के लिए बेकारहो गया।


*धौलपुर का युद्ध 1519*
इस युद्ध में राणा के साथ थे राव विरमदेव मेड़ता, रतन सिंह चुंडावत, माणिकचन्द्र चौहान, चन्द्रभान चौहान, रावल उदय सिंह, राणा अज्ज, राव रामदास, गोकलदास परमार, रावल उदय सिंह वगारी, मेदिनी राय।खतौली की हार का बदला लेने के लिए इस बार पूरी तैयारी के साथ आया था इब्राहिम लोधी। पर रणभूमि में लोधी की फ़ौज यूँ बिखरी जैसे किसी वृक्ष की सूखी पत्तियां हों।राणा की सेना का सामना मियाँ माखन, खान फुरात, हाजी खान, दौलत खान, अल्लाहदद खान एवं यूसुफ़ खान की हज़ारों की फ़ौज से हुआ। पर कुछ ही देर में राजपूतों की तलवारों में वो रक्तपात मचाया कि सुल्तान की सेना भागने को मजबूर हो गयी। राणा की सेना में सुल्तान की फ़ौज को बयाना तक धकेल दिया।हुसैन खान ने दिल्ली में मुस्लिम दरबारियों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि "सैकड़ों दफ़ा लानत है कि 30,000 की फ़ौज चंद राजपूतों से हार गयी"इस युद्ध के बाद मालवा जिस पर मुहम्मद शाह काबिज़ था, उस पर राणा का आधिपत्य हो गया।


*गागरोन का युद्ध 1519*
राणा सांगा द्वारा मेदिनी राय को दी गयी जागीर पर धीरे-धीरे महमूद ख़िलजी काबिज़ होने लगा। राणा ने उसे सबक सिखाने की ठान ली औरयुद्ध के लिए चित्तौड़ से कूच किया, उनके साथ राव विरमदेव थे। राणाऔर राव का सामना हुआ महमूद ख़िलजी और आसिफ खान से। राजपूतों के आक्रमण से ख़िलजी की विशाल सेना में हाहाकार मच गयी। उसके लगभग सभी प्रमुख सैन्य अधिकारी मारे गए और तकरीबन सारी सेना का सर्वनाश हो गया। आसिफ खान का पुत्र मारा गया और महमूद ख़िलजी को बन्दी बना लिया गया।लेकिन परंपरागत राजपूती उदारता का परिचय देते हुए राणा ने उसे मुक्त किया एवं सम्मान सहित उसका राज्य लौटा दिया पर ख़िलजी ने राणा की अधीनता स्वीकार करते हुए नज़राने के रूप में अपना पुश्तैनी रत्न-जड़ित मुकुट और कमरबन्द राणा को दे दिया।इतिहासकार अबू फ़ज़ल ने राणा की सतत प्रशंसा की।


*गुजरात का युद्ध 1520*
ईडर की कमान वापस राव रायमल को दिलाने एवं मुस्लिम सुल्तान से गुजरात को मुक्त कराने राणा ने युद्ध का ऐलान किया।राणा अत्यंत महत्वाकांक्षी थे, हिन्दू राष्ट्र की स्थापना उनका उद्देश्य था।कहा जाता है कि निज़ाम-उल-मुल्क के सामने भरे दरबार में एक बार किसी भाट/चारण ने राणा की बहादुरी और उदारता की भूरि-भूरि प्रशंसा की जिससे खिन्न हो कर निज़ाम उल मुल्क ने राणा के लिए अपमानजनक शब्द कहे, इस उद्दंडता की सज़ा राणा निज़ाम को देना चाहते थे।युद्ध का आवाह्न कर राणा ने गुजरात की ओर कूच की। मुज़फ्फर शाह को जैसे ही इसकी भनक लगी वो राणा का सामना किये बगैर किवाम उल मुल्क को अहमदाबाद का राजपाल बना कर मुहम्मदाबाद भाग गया।महाराणा 40000 घोड़ों और पैदल सैनिकों के साथ वागड़ पहुँचे, वहाँरावल उदय सिंह डूंगरपुर 5000 सैनिकों समेत उनके साथ हो लिए, रावविरमदेव मेड़तिया 5000 सैनिकों के साथ आये और राव गंगा ने अपने पुत्रों को 7000 सैनिकों के साथ भेजा।राणा तेज़ी से ईडर पहुँचे, निज़ाम उल मुल्क राणा के आने की सूचना पाकर अपनी डींगें भूलकर हिम्मतनगर की ओर भागा। राणा ने ईडर की कमान वापस रायमल के हाथों में दी और निज़ाम उल मुल्क की तलाश में निकले,राणा ने हिम्मतनगर गढ़ की घेराबन्दी करा दी, भीषण रक्तपात हुआ, इस दौरान राणा की सेना के एक शीर्ष अधिकारी डूँगर सिंह चौहान गंभीर रूप से घायल हो गए। राजपूतों ने गढ़ की सारी मुस्लिम सेना का वध करदिया पर मुबारिज़ उल मुल्क बच निकला। वह किले के साथ बहती हुई नदी के किनारे पर रुका, उसके साथ सुल्तान द्वारा भेजा हुआ सैन्य दस्ता था।राणा ने उन पर आक्रमण कर दिया, सुल्तान की फ़ौज भाग छूटी और उल मुल्क अहमदनगर की ओर भागा। ब्रिटिश प्रशासक एलेग्जेंडर फोर्ब्स लिखते हैं, " इस्लाम के व्यूह को राजपूतों के रोष ने ध्वस्त कर दिया, सुल्तान की सेना के कई शीर्ष अधिकारी मारे गए, मुबारिज़ उल मुल्क गंभीर रूप से घायल होगया,उनके हाथी छीन लिए गए..फ़ौज में हाहाकार मच गयी। राणा ने वाडनगर के ब्राह्मणों को छोड़ दिया, विसलनगर के राजपाल हातिम खान का वध किया। जब राणा ने देखा की सुल्तान अब वापस नहीं आएगा और बड़बोले निज़ाम उल मुल्क को भी उसकी उद्दंडता का अच्छा सबक मिल गया है तो वे चित्तौड़ लौट गये।


*खानवा का युद्ध 1527*
बाबर ने उत्तर भारत में भयंकर लूटपाट मचाई, कई निर्दोष हिंदुओं की निर्मम हत्या की। राणा ने हिन्दू राष्ट्र की स्थापना और और राष्ट्र को विदेशी आक्रमणकारियों से मुक्त कराने के उद्देश्य सेबाबर के विरुद्ध युद्ध का आवाह्न किया और बाबर को देश छोड़ने का आदेश दिया।पानीपत की लड़ाई के बाद बाबर जान चुका था कि राणा उसके लिए बहुत बड़ा खतरा थे। राणा ने आगरा की ओर कूच किया,बाबर ने धौलपुर, ग्वालियर और बयाना की ओर सैन्य टुकड़ियां भेजीं।इधर राणा के नेतृत्व में सभी राजपूत राजघराने एक हुए (जालोर, सिरोही, हाड़ौती,डूँगरपुर, धुआंधार, आमेर, मारवाड़, चन्देरी-मालवा) मेवात के मैड़ राजपूत भी राणा के साथ थे। राजपूतों की आक्रामकता और वीरता सुप्रसिद्ध थी, बाबर की सेना में भय व्याप्त था। बाबर नेराज्य की सारी मदिरा बहा दी, और सैनिकों को किसी भी प्रकार का नशाकरने से मना कर दिया ताकि युद्ध के दौरान वो कमज़ोर न पड़ें। बाबर ने अपनी फ़ौज को राणा के विरुद्ध युद्ध को जिहाद बताया और दरबारियों एवं सैनिकों से क़ुरांन की कसमें खिलवायीं।

_युद्ध -16 मार्च, 1527_
फतेहपुर सीकरी के निकट खानवा।
बाबर ने रण क्षेत्र का बारीकी से निरीक्षण किया एवं योजनाबद्ध तरीके से व्यूह रचा, बंदूकधारियों एवं तोपों को स्थापित किया।यूँ तो राणा सांगा ने कई युद्ध लड़े थे और सभी जीते थे, पर वो परम्परागत तरीके से जीते युद्ध थे। राणा ने हमला बोला, जब राणा कीसेना बाबर द्वारा रचित व्यूह में फंस गई तब बाबर ने तोपों और बंदूकों से हमला करवाया। भीषण रक्तपात हुआ। अनेक राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए, राणा गंभीर रूप से घायल हुए। 30 जनवरी 1528 को राणा ने देह त्याग दी, अखण्ड हिन्दू राष्ट्र का उनका स्वप्न उन्हीं के साथ चला गया। अंत समय में उनके शरीर पर 80 घाव थे। एक हाथ, एक पैर और एक आँख खो कर इस महाबली योद्धा ने बाबर जैसे शक्तिशाली सुल्तान से लोहा लिया और दिल्ली की सल्तनत हिला कर रख दी। अपने पूरे शासन काल में राणा ने सभी युद्ध जीते। तमाम इतिहासकारों का कहना है कि अगर बाबर के पास वो आधुनिक तोपें और बंदूकें ना होतीं तो वो राणा और राजपूतों की तलवारों को कभी पराजित नहीं कर पाता। राणा के साथ एक युग का अंत हुआ,उन जैसा महाबली कुशल सुशासक योद्धा दुबारा नहीं जन्मा। मातृभूमि की लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले इस शूरवीर को कोटि-कोटि नमन एवं श्रद्धांजलि।
*जय भवानी*
*जय महाराणा*
डॉ• नीतीश सिंह सूर्यवंशी